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अंतर्वस्तु दृश्य मार : 44910


याचिका

                                           दिनांक 31.10.09

माननीय...............................................................................................   

सेवा में

इंडियन एजुकेशन फोरम

(और मुन्नार मानवर मनरम)

ईस्टं डिविज़न, गुण्डल एस्टेट

एस. बी.पुरम (डाक), इडुकी जिला)

केरल राज्य पिन  685617

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आदरणीय महोदय,

 

विषय: सरकारी संस्थानों में भारतीय भाषा माध्यम के छात्रों/उम्मीदवारों को समान अवसर का निषेध और व्यावसायिक उच्च शिक्षा में असमान प्राप्ति संबंधी

माननीय भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री.के.जी बालकृष्णन ने एक फैसले में कहा है कि राज्य सरकार ने केरल में शिक्षा के माध्यम के रूप में मलयालम पर ज़ोर दिया हैं। इससे प्राथमिक स्कूलों में इस वर्ष 2.5 लाख कम प्रवेश दर्ज हुए हैं। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने केलिए वे अन्य राज्यों में पलायन करते हैं। अंग्रेज़ी में शिक्षा देने वाले निजी स्कूलों में प्रवेश पाने केलिए 50,000/ रुपए तक खर्च करने में माता पिता इतना पागल हो रहे है?। क्या यही वे चाहते है?''। हमारे देश के सर्वोच्च विधि पालकों ने यह भी स्वीकार किया है कि वर्तमान परिस्थिति में भारतीय भाषा माध्यम के स्कूलों में पढ़नेवाले छात्रों के 94% का कोई भविष्य नहीं है और वे लिपिक भी नहीं बन सकते। यह तथ्य कानून और नीति निर्माताओं की आँखें खोलनेवाला है। ग्रामीण एवं शहर की पृष्ठभूमि से आनेवाले गरीब जैसे विशाल जनताओं के क्रूर भाग्य से वे अवगत हो जाए। भाषाई भेदभाव के कारण सबसे अधिक प्रभावित जनता पिछड़े वर्ग की है। जिसमें मुख्यतः आदिवासी, दलित, मुस्लिम अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियों के लोग आते हैं।

    इसका निहितार्थ दोहरा है। पहला समाधान यह है कि उपसहारन आफ्रिका के अनुसार सब को अंग्रेज़ी माध्यम से शिक्षा दें और भारतीय भाषा माध्यम स्कूलों से उन्हें दूर रखे। अध्ययनों से पता चलता है कि यह असफल प्रयास है। दूसरा समाधान यह है कि विश्व के विकसित राष्ट्रों की तरह उच्च शिक्षा और रोज़गार अवसरों में समान प्राप्ति का अवसर प्रदान करके भारतीय भाषाओं को समृद्ध एवं सशक्त बनाए। दूसरा समाधान गान्धीवादी समाधान है जिसका अनुसरण पूर्वी एशिया (फिलिप्पाइन्स व मलेशिया को छोड़कर) यूरोप, नए देशों और संक्रमित अर्थव्यवरथा के सभी देशों द्‌वारा किया जा रहा है।

भारतीय समस्या

    अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों के प्रति लगाव और भारतीय भाषा माध्यम के स्कूलों के प्रति उदासीनता केरल में अजीब बात नहीं है। भारत के प्रत्येक राज्य भारतीय भाषा माध्यम स्कूलों से छात्रों के पलायन का सामना कर रहा है। यह स्वाभाविक स्थिति नहीं है बल्कि औपनिवेशिक  विरासत की देन है जो घोर भाषाई भेदभाव को खुले तौर पर रेखांकित करती है।

मातृभाषा का महत्व

    अध्ययनों से पता चलता है कि मातृभाषा पर आधारित शिक्षा बेहतर साक्षरता और संख्यात्मक क्षमता का कारण बनता है। किसी भी विकसित राष्ट्र चाहे  वह जी 8 हो, यूरोपीय संघ के सदस्य हो, या ओ ई सी डी देश हो, प्राथमिक स्तर पर विदेशी भाषा में अध्यापन कार्य नहीं चलाते हैं। वस्तुतः ये सभी देश अपनी मातृभाषाओं में विश्वविद्यालय स्तर पर सब कुछ सिखाते हैं। अन्तर्राष्ट्रीय मंचों एवं उच्च शिक्षा केलिए यूरोपीय देशों तथा पूर्वी एशिया की लाखों जनता की छोटी भाषाएँ मान्यता प्राप्त की हैं।

 

 

हमसे क्या कहा गया : मिथकें

·                अंग्रेज़ी भाषा प्रेमियों का मानना है कि इंजीनियरिंग और मेडिसन में शिक्षा के माध्यम बनाने केलिए भारतीय भाषाएँ अनुपयुक्त है जिसका ताजमहल, आगरा किला या दक्षिण भारत के श्रेष्ठ मन्दिरों के निमार्ण में उपयोग की गई थी। विख्यात मंगोलिया राष्ट्रीय विश्वविद्यालय में भारत की सहायता से रथापित अटल बिहारी बाजपेयी आइ टी और टेलिकम्यूनिकेशन केन्द्र में अध्यापन कार्य मंगोलियाई भाषा में हो रहे है जिसको बोलने वालों की संख्या केवल 27 लाख हैं। भारत में मलयालम और हिन्दी बोलनेवालों की संख्या क्रमशः 347 लाख और 5500 लाख हैं, लेकिन भारत को अपनी रथानीय भाषाओं में अध्यापन करने का विशेषाधिकार नहीं है।

·                अंग्रेज़ी आधारित उच्च शिक्षा अनिवार्य है और अंग्रेज़ी भाषा उपनिवेशवाद का उपहार है।

·                भारत को वैश्विक भाषा उपयोग करने का सौभाग्य मिला है जिससे भारत का विकास हुआ है, ही नहीं इसने भारत को एक ज्ञान संपन्न अर्थव्यवस्था बना दिया है।

·                लोगों को एकीकृत करने का कार्य अंग्रेज़ी करती है और इसके उपयोग से राष्ट्रीय अखंडता मजबूत होती है।

·         भारतीय भाषाएँ अविकसित हैं, इसलिए विज्ञान तथा विद्वता केलिए   व्यवहार्य नहीं है।

 

हमसे क्या नहीं कहाः तथ्यें

·               भारतीय भाषाओं को छोड़कर विश्व की सभी प्रमुख भाषाएँ व्यावसायिक शिक्षा, अन्तर्राष्ट्रीय मंचों और साइबर क्षेत्र केलिए मान्यता प्राप्त की हैं।

·               अन्य विकासशील देशों की तुलना में भारत सहित सभी विकासशील जो उपनिवेशीय भाषा पर निर्भर हैं, अधिक लोगों को गरीब, अशिक्षित एवं अल्पपोषित बनाते हैं।

·               देशी भाषा-भाषी राष्ट्रों की तुलना में उपनिवेशी भाषा-भाषी राष्ट्रों में दीर्घकालीन आर्थिक विकास लगातार कम पाए गए हैं।

·               राजभाषा नीति का मूल्यवर्धन उपनिवेशीय भाषा का समर्थन करता है जो करोड़ों जनताओं को अधिकार से वंचित करते हैं और संपर्क भाषा के जैविक विकास में हानि पहूँचाता है।

·               शिक्षा और अनुवाद में अफसरशाही के दिशा निर्देशों से कोई परिणाम नहीं निकलेगा। अद्यतन ज्ञान केवल प्रतियोगी पाठय-पुस्तक लेखन से पैदा करेगा।

·     उच्चतम न्यायालय या संसद में प्रयुक्त भाषा महत्व नहीं रखती है लेकिन संगठित क्षेत्र में कार्यबलों की भर्ती में प्रयुक्त भाषाएँ महत्व रखती है। बेहतर सेवा निष्पादन केलिए नागारिकों की भाषा वही होनी चाहिए।

 

 

भारतीय भाषाएँ क्यों नहीं

·                भारत में अंग्रेज़ी भाषा की सीख उसमें निहित श्रेष्ठता या अंग्रेज़ी संस्कृति के सौन्दर्य शास्त्र या संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के आर्थिक व प्रौद्योगिकीय वीरता केलिए नहीं की जा रही है, बल्कि वैश्विक सामान्य भाषा के रूप में की जा रही है। लेकिन सरकार और उद्योग में मान्यता केलिए अंग्रेज़ी सीखी जा रही है जहाँ अंग्रेज़ी में दक्षता रखने की आर्थिक समझदारी रखती है। जबकि राज्यों के समर्थन और व्यावसायिक पाठ्‌यक्रमों की नींव पर बनाई गई आर्थिक क्षेत्र से भारतीय भाषाएँ विस्थापित हो रही हैं। उच्च श्रेणी की नौकरी केलिए सरकारी मान्यता का अभाव एक कारण है। वित्तीय रूप से संपन्न संघ के अफसरशाही द्‌वारा व्यावसायिक पाठ्‌यक्रमों में भारतीय भाषाओं के उपयोग से इनकार किया जा रहा हैं । इसी वजह से अंग्रज़ी अच्छे जीवन के अनिवार्य घटक बन गया है।

·                अंग्रेंज़ी का मूल्य अनिवार्य रूप से ऊँचा है। उपनिवेशीय भाषा-भाषी राष्ट्रों के लोग अविकास से उत्पन्न सामाजिक अरिथरताओं और कुलीन वर्ग द्‌वारा उत्पन्न असमानताओं का सामना कर रहा है।

·                अंग्रेज़ी का भय एक मज़ाक है जिससे अंग्रेज़ी में शिक्षित कुलीन वर्ग को लाभ मिलते है। भारतीय भाषाओं की रोज़गार क्षमता में सुधार लाए।

·                अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों पर प्रतिबन्ध लगाने की जरूरत नहीं है, भारतीय भाषा माध्यम के स्कूलों को सशक्त बनाए तथा सरकार द्‌वारा निधि पोषित अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों जैसे केन्द्रीय विद्यालय, में भारतीय भाषाओं में अध्यापन हो और प्रतिभाशाली छात्रों केलिए स्कूलों की रथापना करें।

·                जनतंत्र/लोकतंत्र तब सशक्त होंगे जब सरकार जिस भाषा में वोट माँगती है उसी भाषा में जनता का संबोधन करें, वरिष्ठ सिविल सेवकों का ऊपर से नीचे तक चयन करने से प्रशासनिक प्रतिभा के पूर्ण विनियोग से वंचित होते हैं और नवीन और सामाजिक दायित्व की पूर्णता से वंचित होते हैं।

    भाषा अकादमियाँ तथा पूर्ण रूप से भाषा विभागें भारतीय भाषाएँ विकसित नहीं कर सकते। भारतीय भाषा माध्यम के मेडिकल कांलेज, सुसज्जित इंजीनियरिंग कालेज तथा प्रबन्धन संस्थान न केवल भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देंगे, बलिक भारत में आर्थिक विकास की गति तेज़ करेगे।

 

जब अर्मेनिया लिपि में लिखी जानेवाली अर्मेनियाई भाषा जो भूकंप प्रवण अर्मेनिया के पहाड़ी क्षेत्र के 32 लाख जनताओं द्‌वारा बोली जाती है, सिरिक लिपि में लिखी मंगोलियन भाषा जो एशिया के भीतरी गोबी रेगिस्तान के 26 लाख लोगों द्‌वारा बोली जाती है, भारतीय बाह्‌मी लिपि से अपनाई गई लिपि में लिखी बाढ़ प्रवण लाओ गणतंत्र के 62 लाख लोगों की लाओयिंन भाषा और वैसे ही अनेक अन्य छोटी भाषाएँ जैसे अलबेनियन, स्लोवक, किरगिज़, असेरी, एस्टोनियन, हीब्रू, ताजिक, फिनिश आदि विभिन्न भाषाओं का उपयोग व्यावसायिक शिक्षा में किया जा सकता है तो करोड़ों द्‌वारा बोली जानेवाली भारतीय भाषाओं को ख्यातिप्राप्त मेडिकल कालेज, भारतीय प्रबन्धन संस्थानें और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों में व्यावसायिक शिक्षा का माध्यम क्यों नही बना सकते ?

 

     इस याचिका में हम विनम्र प्रस्तुत करते हैं कि भाषाई साम्राज्यवाद जिसको कुलीन वर्ग द्‌वारा न्यायसंगत और मज़बूत किया जाता है, करोडों  लोगों के जीवन बरबाद कर देते हैं, विकास संबधी आंतकवादियों की सृष्टि करते हैं और देश की एकता और अखंडता को कमज़ोर कर देते हैं। राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी का कहना कितना सच है कि “विदेशी शासन की कई बुराइयों में देश के युवकों पर विदेशी माध्यम थोपना'' इतिहास द्‌वारा सबसे श्रेष्ठ समझा जाएगा। इस भाषा ने देश की ऊर्जा नष्ट कर दी, लोगों के जीवन छोटा बना दिया, जनसमूह से उन्हें अलग कर दिया, शिक्षा को अनावश्यक रूप से महँगा बना दिया। यदि यह प्रक्रिया अभी बढ़ रही तो देश की आत्मा लूटने का प्रयास रहेगी। इसलिए जल्दी ही विदेशी भाषा माध्यम की निद्राजनक मोह से शिक्षित भारत जाग उठे और स्वंय अपने को मुक्त करें, यह भारत और जनता केलिए बेहतर रहेगा।

 

विनम्रता पूर्वक निवेदन है कि प्राथमिक स्कूलों के 13.169 करोड़ बच्चों के  94% भारतीय भाषा माध्यम स्कूलों में पढ़ रहे हैं। अंग्रेज़ी की भाषाई साम्राज्यवाद और अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों के प्रति आसक्ति अफसरशाही जिसमें कुलीन वर्ग प्रबल हैं, की नीतियों का परिणाम है। ये अंग्रेज़ी बनाम भारतीय भाषाओं के आधार पर लोगों का भेद-भाव खुले तौर पर करते है वे निम्नप्रकार है,

 

1.   भर्ती नीति का केन्द्रीकरण तथा भारतीय संविधान के प्रावधानों का अतिक्रमण करते हुए संघ सरकार की रोज़गार अवसरों में भारतीय भाषाओं के खिलाफ घोर भेदभाव।

2.   अन्य सभी भारतीय भाषाओं को समान अधिकार प्रदान किए बिना पक्षपातपूर्ण भाषा नीति अंग्रेज़ी का समर्थन करता है।

3.   अखिल भारतीय सेवाओं के औपनिवेशिक मॉडल ज़ारी रखना राज्यों में राजभाषा नीति के सफल कार्यान्वयन में वास्तविक बाधा पहूँचाना है।

4.   वरिष्ठ सिविल सेवकों केलिए भर्ती नीति की बन्द प्रणाली में अफसरशाही बेकार अवस्था में रहते है। यह कार्य लोकतंत्र को अंधेरे में छोड़ देते है और सरकार को बुरी तरह नियंत्रित करते है।

5.   व्यावसायिक शिक्षा में भारतीय भाषाओं का निषेध कर केन्द्र सरकार केवल अंग्रेज़ी माध्यम के उच्च शिक्षा संरथानें जैसे आई आई टी व आइ आइ एम की स्थापना करती हैं इससे यह समझा जाता है कि भारतीय भाषाएँ विज्ञान और विद्वता केलिए उपयुक्त नहीं है।

6.   राष्ट्र नेताओं की दूरदर्शिता के विपरीत अंग्रेज़ी नीति निर्माताओं ने भारतीय जनताओं पर अवसरों का निषेध बनाए रखने केलिए कुछ मिथकें उत्पन्न करते हैं जो इस प्रकार है.  (i) भारत अंग्रेज़ी भाषा द्‌वारा एकीकृत है (ii) विज्ञान और प्रोद्योगिकी केलिए भाषाएँ अनुपयुक्त हैं। (iii) भूमंडलीकरण और आर्थिक विकास केलिए विश्व भाषा की आवश्यकता है।

7.   राज्य सरकार यदि व्यावसायिक शिक्षा राज्य की भाषाओं में प्रदान करना चाहते हैं तो भी वे इसमें पराजित होती है। इसका कारण संघ के अफसरशाही द्‌वारा समर्थित अंग्रेज़ी केन्द्रित शिक्षा प्रणाली जो प्रतिभाओं को आकर्षित करती हैकी  उपरिथति  है।  अतः केन्द्रीय  सरकार  की एक समन्वित दृष्टि इसके लिए अनिवार्य है।

 

    अंग्रेज़ी माध्यम स्कूलों के प्रति बढ़ती आसक्ति का मूल कारण अंग्रेज़ी भाषा प्रेमी कुलीन वर्ग द्‌वारा नियंत्रित वित्तीय केन्द्र की इन नीतियाँ है, जहाँ भारतीय  भाषा  माध्यम छात्रों को दूसरी श्रेणी की प्रजा मानकर केन्द्रीय सरकार की नौकरी और चालू व्यावसायिक शिक्षा केलिए सुयोग्य नहीं समझता है।


 

विनम्र प्रस्तुतियाँ

 

 

भाषाई साम्रज्यवाद के निहितार्थ

1.   निवेदन है कि शिक्षा और रोज़गार अवसरों में भारतीय भाषा माध्यम छात्रों का घोर भेदभाव है जो जनता की वास्तविक जरूरतों की अपेक्षा औपनिवेशवादी मानसिकता की विशेषताएँ है (भाग 1)

2.   निवेदन है कि संघ सरकार की नौकरियों में अंग्रेज़ी भाषा अनिवार्य बनाकर भारतीय भाषा माध्यम छात्रों को वंचित करते है। बिडबंना यह है कि भारतीय भाषाएँ हमेशा बोलनेवाली ग्राहकों और जनताओं की सेवा करने केलिए अंग्रेज़ी भाषा अनिवार्य बना देती है। (भाग 2)

3.   निवेदन है कि संघ लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार बोर्ड अंग्रेज़ी बोलनेवाले शहरी कुलीन वर्ग के पक्ष में रहकर ग्रामीण भारतीय भाषा माध्यम छात्रों पर खुले तौर पर भदे-भाव करते हैं । (भाग  3)

4.   निवेदन है कि भारतीय भाषाओं (और अरबी) को छोड़कर सभी प्रमुख भाषाएँ व्यावसायिक पाठ्‌यक्रमों में शिक्षा का माध्यम है। (भाग 4)

5.   निवेदन है कि शिक्षा के प्रत्येक स्तर में समापन एवं निष्पादन खराब है जिसका मापन व्यावसायिक पाठ्‌यक्रमों में सकल भर्ती अनुपात, स्कूल छोड़नेवालों की दर और छात्रों के समानुपात से किया है। यह भारत जैसे उपनिवेशीय भाषा-भाषी राष्ट्रों के करोड़ों बच्चों को अशक्त बनाता है। (भाग 5)

6.   निवेदन है कि उच्च शिक्षा में विदेशी भाषा के उपयोग से अनसंधान एवं वैज्ञानिक उपज की गुणवत्ता प्रभावित हैं। (भाग 6)

7.   इन बातों का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध हैं कि शिक्षा के लिए विदेशी भाषा का उपयोग करने से आर्थिक विकास में कमी होती है, गरीबी की घटाव में धीमी गति आती है तथा अल्प-पोषितों की संख्या में वृद्धि होती है। इसके अलावा मानव विकास एवं महिला सशक्तीकरण पर नुक्सान पहूँचाता है। (भाग 7)

8.   निवेदन है कि केन्द्र और राज्यों की सरकारों को छोड़कर विश्व के सभी अन्य देश जिसमें आफ्रिका देश अपवाद है जनता की भाषा में जनता का संबोधन करते हैं। (भाग 8)

9.   निवेदन है कि भारतीय भाषाओं और विश्व के अन्य भाषाओं के बीच डिजिटल डिवाइड सीमित रूप से खराब है। न तो सरकारी निधि पोषित विश्व विद्यालयों, अनुसंधान संगठनों और न ही उद्योग विशाल जनताओं की देख-भाल नहीं करते हैं।   (भाग 9)

10.  निवेदन है कि अफसरशाही को जनता की सेवा केलिए जिम्मेदार बनाने में लोकतंत्रिक शक्तियाँ की असमर्थता ही नक्सलवादियों के प्रादुर्भाव का मूल कारण है। उपनिवेशीय करिअर आधारित वर्तमान अफसरशाही को विश्व के सभी देशों की तरह पद आधारित अफसरशाही के रूप में परिवर्तित करके अफसर शाही को जिम्मेदार बनाना है। (भाग 10)

11.  निवेदन है अंग्रेज़ीयत राष्ट्रवाद के विरुद्ध है और राष्ट्र की एकता केलिए बड़ी चूनौती है। विकास और राष्ट्रीय एकता केलिए जनता की भाषा को बढ़ावा देना चाहिए ।     (भाग 11)

12.  निवेदन है कि भूमंडलीकरण की चूनौतियों का सामना करने केलिए भारत की मदद करने के बदले अंग्रेज़ी ने भारतीयों को अशक्त बना दिया है। भारत जैसे उपनिवेशीय भाषी राष्ट्रों की तुलना में देशी राष्ट्रों ने दुनिया के साथ अधिक समन्वय किया है।     (भाग 12)

13.  निवेदन है दक्षिण एशिय, उप सहारन आफ्रिका, अरब देशों, फिलिपाइन्स एण्ड मलेशिया को छोड़कर अधिकांश देशों ने देशी भाषाओं को सशक्त करके भाषा में सफल परिवर्तन प्राप्त किए हैं। पूर्वी एशियाई राष्ट्रों जैसे वर्ष 1950 में कोरिया, ताइवान, चाइना, इण्डोनेशिया, वियतनाम, ताइलैंड और इस्राइल, वर्ष 1970 में ईरान और अफगानिस्तान, 1990 में स्वतंत्र राष्ट्रों के काँमनवेल्थ ने राजभाषा परिवर्तन किया हैं साथ ही स्कूल एवं विश्वविद्यालयों के शिक्षा माध्यम में सफल बदलाव लाया है। (भाग 13)

14.  निवेदन है कि अनुवाद के क्षेत्र में कोई प्रयास या परिवर्तन लाने में अफसर शाही उदासीन और असमर्थ है। भारतीय भाषाओं में और भारतीय भाषाओं से अऩुवाद कार्य विश्व में सबसे कम है। भारत सरकार इस क्षेत्र में भारतीय भाषाओं को शामिल करने केलिए गूगल ट्रान्सलेट जैसे मशीन अनुवाद कंपनियों का समर्थन और समन्वय करें।    (भाग 14)

15.  निवेदन है कि भारत में अंग्रेज़ी के उपयोग का दुरुपयोग अधिक होता है। भारत सरकार उम्मीदवारों से अंग्रेज़ी बोलने की परीक्षा बन्दकरें और विश्व के अन्य सभी देशों की तरह समझदारी के साथ अंग्रेज़ी के वाचन पर महत्व दें।          (भाग 15)

16.  निवेदन है कि अंग्रेज़ी आधारित शिक्षा ने आफ्रिका के अधिकांश अंग्रेज़ी प्रेमी राष्ट्रों के शिक्षा क्षेत्र का सर्वनाश किया है और डाक्टर एवं नेर्सों के निगर्मन के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र का विध्वंस किया है।  (भाग 16)

 

विश्वविद्यालयों के शिक्षा माध्यम में परिवर्तन लाए

17.  निवेदन है कि शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने केलिए राज्य सरकारों की सहायता से केन्द्र सरकार सभी सार्वजनिक निधि पोषित कालेजों के शिक्षा माध्यम भारतीय भाषाओं में परिवर्तित करने केलिए तुरन्त कार्रवाई करें। भारतीय भाषाओं के सशक्तीकरण के ज़रिए भारतियों का सशक्तीकरण, इससे बढ़कर कोई सशक्तीकरण नहीं है।

 

    भारतीय भाषाओं में प्रतिभा संपन्न छात्रों केलिए स्कूल और केन्द्रीय विश्व विद्यालय

18.  निवेदन है कि आप संघ के शिक्षा मंत्रालय को सिफारिश दे सकता है कि संघ द्‌वारा प्रस्तावित 50 केन्द्रीय विश्व विद्यालयों तथा प्रतिभा संपन्न छात्रों केलिए प्रस्तावित 6000 स्कूलों में शिक्षा के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं को उचित सम्मान क्यों नहीं देते है? इसका जवाब दिए बिना अंग्रेज़ी भाषा प्रेमियों की नीतियाँ चलाने से सरकार को रोक दें। विश्व भर में यह स्वीकार किया जाता है कि विज्ञान और गणित की पढ़ाई मातृभाषा होनी है तथा स्नातक स्तर तक व्यावसायिक शिक्षा और अधिमान्यता से स्नातकोत्तर तक अध्यापन मातृभाषा में होनी चाहिए।

 

    भारतीय भाषाओं में शिक्षा देनेवाले आइ आइ टी और आइ आइ एम की स्थापना करें

 

 

19.  निवेदन है कि आप संघ सरकार को सलाह दी जा सकती है कि वे भारतीय भाषाओं के शिक्षा माध्यम वाले आइ आइ टी तथा आइ आइ एम जैसे उच्च शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करें जैसे भाषाई भदेभाव के शिकार करोड़ बच्चों को बचाने केलिए विश्व के प्रत्येक अन्य छोटी भाषाओं का उपयोग किया गया है। इसका कोई आधार नहीं है कि व्यावसायिक कालेजों में प्रत्येक छोटी भाषाओं का उपयोग करते समय भारतीय भाषाओं का उपयोग नहीं किया जा सकता है।

 

    सार्वजनिक निधि पोषित अनुसंधान भारतीय भाषाओं में करें

20. निवेदन है कि जिस प्रकार अन्य देशों द्‌वारा किया जा रहा है उसी प्रकार विभिन्न राज्यों में रिथत सार्वजनिक निधि पोषित अनुसंधान संस्थान अपनी अनुसंधान संबंधी रिपोर्ट एवं खोज अनिवार्य रूप से भारतीय भाषाओं में प्रकाशित करें ताकि नागरिक अद्यतन अनुसंधानों से अवगत हो सके। सामान्यतः जनताओं को खासकर नीति और विधि निर्माताओं को नीति संबंधी विवरण से अच्छी तरह अवगत कराए जा सके।

 

      

समितियों में अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ

21.  निवेदन है कि केन्द्र और राज्य सरकारों द्‌वारा गठित शिक्षा सबंधी समितियाँ अंग्रेज़ी केन्द्रित है । विभिन्न राष्ट्रों से अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ और शैक्षणिकविदों मुख्यतः भाषा वैज्ञानिकों और शिक्षाविदों, को नीति निर्माण समितियाँ और निकायों में शामिल करने की आवश्यकता है।

22. निवेदन है कि उच्च शिक्षा में राष्ट्रीय ज्ञान आयोग और यशपाल समिति जैसी समितियाँ को विभिन्न क्षेत्र की जनता की राय जानने केलिए सभी राज्यों की राजधानी सहित देश के विभिन्न स्थानों पर बैठक आयोजित करनी चाहिए।

 

अफसरशाही प्रायोजित डिजिटल डिवाइड

23. निवेदन है कि सरकार प्रायोजित डिजिटल डिवाइड के फलस्वरूप साइबर क्षेत्र से भारतीय भाषाएँ निकाल दी गई हैं। एन आई सी (राष्ट्रीय सूचना केन्द्र) फिलहाल भारतीय भाषाओं में वेबसाइटें तैयार करने में असमर्थ एक अफसरशाही संगठन है, को त्रिभाषी या बहुभाषी साइटें तैयार करने का दायित्व देने के बदले प्रत्येक विभाग को सभी भाषाओं में सूचना प्रदान करने केलिए बहुभाषी वेबसाइटें तैयार करने की आज़ादी दें।

24. निवेदन है कि यह शर्म की बात है कि भारत के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और संसद के वेबसाइटें केवल अग्रेज़ी में है। अन्य राष्ट्रों में सभी भाषाओं को समान महत्व देते हैं। उसी प्रकार भारतीय भाषाओं को समान महत्व दें। संघ सरकार की वेबसाइट यूरोपीय संघ की वेबसाइट europa .eu'' का अनुकरण कर सकता है।

25. निवेदन है कि जिस प्रकार विश्व के सभी राष्ट्रों में हो रहा है उसी प्रकार विश्व विद्यालय प्रत्येक कम्प्यूटर में भारतीय भाषाओं की कुंजी पटल (की बोर्ड) लगाने केलिए हार्डवेयर विक्रेताओं से संपर्क करें। रूस में सभी की-बीर्ड रूसी वर्णमाला में, ताइलैंड में ताई और चीन में चीनी भाषा में किया गया है। लेकिन भारत के केंद्र और राज्य सरकारें भारत की लिपियाँ सहित की-बोर्ड जिसका मूल्य थोड़ा अधिक है, नहीं खरीद रहे हैं। केरल सरकार द्‌वारा खरीदी गई पाँच हज़ारों से अधिक की-बोर्ड में मलयालम लिपि का एक भी नहीं है।

 

    संघ सरकार के कार्यपालक अभिकरणों में विकेन्द्रीकृत भर्ती

26. निवेदन है कि भारतीय भाषा माध्यम के छात्रों की रोज़गार क्षमताओं को बढ़ावा देना है। संघ सरकारी संगठनों जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, रेलवे, भारतीय डाक आदि में भारतीय भाषाएँ जाननेवाले लोगों की सेवा केलिए अंग्रेज़ी में दक्षता की जाँच-परख हास्यास्पद है। अंग्रेज़ी की अनिवार्यता के रथान पर भाषाई अल्पसख्यकों को उचित मान्यता देते हुए भारत के राज्यों की भाषाओं को अनिवार्य करना चाहिए।

27. भारत सरकार को इस प्रकार की सलाह दी जाए कि वे राज्य की भाषा में प्राप्त दक्षता के आधार पर संघ की सिविल सेवा परीक्षा में क्षेत्रीय कोटा केलिए राज्य सरकारों के साथ परामर्श करें जिस प्रकार अन्य देशों में हो रहा है उदाहरण के लिए पाकिस्तान। उसी प्रकार अखिल भारतीय सेवाओं के बाहरी और भीतरी कोटा से दूर रहे ताकि राज्य की राजभाषा नीतियों का प्रभावी कार्यान्वयन किया जा सकें। बर्तमान बन्द कैरिअर अफसरशाही की तुलना में पद आधारित खुली सिविल सेवा विश्व का प्रतिमान है।

 

28. निवेदन है कि भारतीय डाक, रेलवे, तेल कंपनियाँ, सार्वजनिक बैक जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के संगठनों को राज्य की राजभाषा में विकेन्द्रीकृत भर्ती नीतियों की असगतियाँ सुधारना है ताकि प्रशासन और सार्वजनिक संगठनों के प्रबंधनों की भाषा वही भाषा बने जिसमें राजनीतिक पार्टियाँ अपनी वोट माँगती है। नागरिकों और ग्राहकों की भाषा भी वही है।

 

29. निवेदन है कि संघ लोक सेवा आयोग की सिविल सेवा परीक्षा एकांगी या पक्षपात पूर्ण है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के आदिवासी जनताओं को मुख्यधारा से निकाल दिया है। भारत के सबसे बड़ा आदिवासी वर्ग गोंडा है जिनका केन्द्रीय सरकार में कोई प्रतिनिधत्व नहीं है और राजस्थान से एक आदिवासी जो स्वंय आदिवासी नहीं कहते, सभी सीटों की एक तिहाई धेरनेवाली आदिवासी जनसख्या के 5% से कम आता है। पश्चिम बंगाल जैसे कुछ राज्यों का वर्षों से कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। इसका एकमात्र उपाय क्षेत्रीय आरक्षण और विकेन्द्रीकृत चयन प्रक्रिया है।

 

     

अनिवार्य अंग्रेज़ी के बदले अनिवार्य भारतीय भाषाएँ

30. संघ सरकारी संगठनों जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों, रेलवे, भारतीय डाक आदि में भारतीय भाषाएँ जाननेवाले जनताओं की सेवा करने केलिए अंग्रेज़ी में दक्षता की जाँच परख हास्यास्पद है। अंग्रेज़ी की अनिवार्यता के स्थान पर भाषाई अल्पसख्यकों को उचित मान्यता देते हुए भारत के राज्यों की भाषाओं को अनिवार्य करना चाहिए । उदाहरण केलिए केरल में भारतीय स्टेट बैंक की राजभाषा मलयालम है और बिहार में यह हिन्दी है जो ग्राहकों की भाषा है। अतः केरल में मलयालम और बिहार में हिन्दी की दक्षता की परख करनी चाहिए। ग्राहकों और कार्यबलों की भाषा ही राजभाषा बन सकती है।

 

     

भाषा आयोजन

31.  निवेदन है कि भारत सरकार भारतीय भाषाओं के रूमानीकरण में मानवीकरण लाने केलिए राज्य सरकारों के साथ समन्वय कार्य करें और भारत की सभी भाषाओं केलिए नागरी लेखन प्रणाली मानकीकृत करें।

32. निवेदन है कि विश्व की सभी भाषाओं केलिए सार्वलौकिक वैज्ञानिक शब्दभडांर की स्वीकृति से भारतीय भाषाओं के विकास में मदद मिलेगी।

अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों केलिए भाषा

33.  निवेदन है कि माननीय भारत के प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय मंचों में संबोधन करते समय पंजाबी भाषा, जो भारत की संत भाषा है या अन्य भारतीय भाषा का उपयोग करें।

34. निवेदन है कि भारत सरकार पाकिस्तान, बंगालादेश, नेपाल और श्रीलंका सरकारों के साथ क्रमश : उर्दू, बंगाली, नेपाली और तमिल जो उनकी राजभाषाएँ है, में संबोधन करें ताकि राष्ट्रों के बीच संबंध दृढ हो सके। बोलियों को समृद्‌ध करें और आदिवासियों  की भाषा का संवर्धन करें।

 

 

 

     

बोलियों को समृद्ध करें और आदिवासियों की भाषा का संवर्धन करें

35. निवेदन है कि अन्य भारतीय भाषाओं की अपेक्षा भोजपूरी, मेवाती और हरियाणी जैसी बोलियों केलिए हिन्दी सबसे बड़ा खतरा है।

36. निवेदन है कि आदिवासी जनताओं की भाषा जैसी गोंडी, भिली, सन्ताली, खासी, घरो, मुंडा अयो, मिसो आदि को राज्यों में समान पदवी देना है और विज्ञान एवं गणित की भाषा के रूप में बढ़ावा देना चाहिए।

37. निवेदन है कि इतिहास की प्रक्रिया में प्रादुर्भव आदिवासी क्रिओल और मिश्रित भाषाओं जैसी नागामीस और अन्य नागा भाषाओं जैसी अंगमी, अयो, कोनालक आदि जो प्रबुद्‌ध जनताओं की निधि है, को बनाए रखने तथा उसमे प्रचार केलिए वित्तीय सहायता प्रदान कर तथा देश के प्रत्येक भाग की भाषाओं की विविधता सुरक्षित रखने का पर्याप्त कदम संघ सरकार उठाए।

 

 

देश की संपर्क भाषा

38. निवेदन है कि देश की संपर्क भाषा के रूप में अंग्रेज़ी या हिन्दी दोनों में से कोई एक को प्रचार करना संघ का कर्तव्य नहीं है जो भाषाओं का उपयोग करनेवाली जनताओं का विशेषाधिकार है। यूरोपीय संघ या यूरोपीय राष्ट्रों में जिस प्रकार हो रहा है उसी प्रकार सभी भारतीय भाषाओं का विज्ञान और सार्वजनिक सूचना की भाषाओं के रूप में प्रोत्साहन एवं संवर्धन करना चाहिए। प्रत्येक इलाके की जनता अपनी सुविधानुसार उपयोग में सहजता के आधार पर अपनी विक्लप का चयन करेंगे।

39. निवेदन है कि एक भारतीय भाषा में बातचीत करने केलिए केन्द्र मंत्री को अनुमति न देनेवाले भारत के संसद के महासचिव को निकाल दिया जाए। भारतीय संविधान में यह प्रावधान है कि प्रत्येक नागरिक जब परिचर्चा में अंग्रेज़ी या हिन्दी में संबोधन करने में असमर्थ है तब वह अपनी भाषा का उपयोग कर सकता है।

40. निवेदन है कि राज्य सभा और लोकसभा की कार्यवाहियों को उसी समय अनुवाद करने केलिए प्रौद्योगिकीय रूप से सुसज्जित होनी चाहिए। जब यूरोपीय संसद 23 राजभाषाओं में उसी समय अनुवाद कर सकते है तो भारत क्यों नही कर सकते?

 

    

 

     

बहुभाषावाद का संवर्धन करें

41.  निवेदन है कि प्रभावी सेवा देने तथा न्याय में तेज़ी लाने हेतु संघ सरकार को निम्नतम न्यायालयों और उच्चतम न्यायलयों में भारतीय भाषाओं के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए।

42. निवेदन है कि संघ सरकार हिन्दी भाषी राज्यों और तमिलनाडु के स्कूलों में बहुभाषी और त्रिभाषी नीति का संवर्धन करें

43. निवेदन है कि राज्य के भीतर या बाहर अन्य भाषा दलों द्‌वारा भारतीय भाषाएँ बहुत कम सीखी जाती है। क्योंकि सभी राज्य भाषाओं में हिन्दी प्रचार सभा के समान भाषा अकादियाँ स्थापित करते हुए भाषाओं के अध्ययन करने हेतु राज्य सरकारों की ओर से कोई प्रयास नही है।

44. जिस प्रकार यूरोपीय संघ में हो रहा है उसी प्रकार पदोन्नति केलिए एक से अधिक भारतीय भाषाओं में दक्षता को अनिवार्य बनाना है जो अंग्रेज़ी की अनिवार्यता को समाप्त करती है। संघ सरकार की रोज़गार अवसरों केलिए भारतीय भाषाओं की पारस्परिक सीख को बढ़ावा देना है।