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11.  भाषा नीति और राष्ट्रीय एकता

 

     भारत मानवता का आशा केन्द्र है क्योंकि भारत नागरिक संघर्ष, तानाशाही को रोकते है, विरोधी पड़ोसी देशों से रक्षा देती है, सभी राज्यों के दुर्बल वर्गों की निगरानी रखती है। ट्रान्सनेशनल संघ जैसे आफ्रिकन संघ, यूरोपीय संघ तथा लाटिन अमेरिका, अरब राज्यों के अन्य प्रयासों आदि, प्रेरण केलिए भारत की ओर ताकता है। फिर भी, भारत के कुलीन वर्ग एक मिथक कायम रखता है कि संघ सरकार एकता केलिए एक आम भाषा थोप दें जो इस समय उपनिवेशीय भाषा है, वह राष्ट्र निर्माताओं के मूल तत्वों के विरुद्ध और देश की एकता एवं अखंडता केलिए हानिकारक है। अंग्रेज़ीवाद राष्ट्रवाद के विरुद्ध है और राष्ट्रीय एकता केलिए खतरा है क्यों कि यह अंग्रेज़ी की भाषाई साम्राज्यवाद को मजबूत करते है, असमानता और अविकास की ओर ले जाते है जो क्रमशः राज्यों की भाषा मज़बूत करने और उत्तराधिकार उचित ठहराते है।

·        जबकि सोवियत संघ के विघटन ने लाटविन, उक्रेनियन, तजिक आदि स्वतंत्र राष्ट्रों के कौमनवेल्थ की प्रत्येक छोटी भाषाओं को सशक्त बना दिया है इन भाषाओं का उपयोग व्यावसायिक पाठ्‌यक्रमों में शिक्षा के माध्यम के रूप में किया जाता है।

·     जबकि अरब समूह के 24 राष्ट्र उसी भाषा बोलती हैं और उसी धर्म का पालन करती है लेकिन एक राष्ट्र के रूप में संस्थापित नहीं होती। वैसे ही अमेरिका के स्पानिश बोलनेवाले 18 राष्ट्रों में हो रहा है, वही इसाई धर्म का पालन कर रहे है।

     राष्ट्रीय एकता केलिए एक साधारण भाषा न तो आवश्यक है  न पर्याप्त है। ग्राम स्वराज संबधी गांधी अवधारण पर आधारित लोकतंत्र और  विकेन्द्रीकरण शान्ति और विकास सुनिश्चित  करते है।

     एक साधारण भाषा के रूप में भूतपूर्व उपनिवेशीय भाषा उप सहारन अफ्रिकन देशों में राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित नहीं की हैं। भारत को अशोक की उदार भाषा नीति का अनुसरण करना है और यूरोपीय संघ और भारतीय सिनेमा की बहुभाषी वाद से सबक सीखें।

यूरोपिय संघ (ई यू) : यूरोपीय संघ में आन्तरिक व्यापार के संचालन की भाषा को व्यवहार्य भाषा कहते है, यह अंग्रेज़ी, फेंच और अंग्रेज़ी हो सकती है। लेकिन सार्वजनिक सूचना और संचार पूर्ण रूप से चालू 23 राजभाषाओं में बहुभाषी चलती है।

महान अशोक  भारत के महान सम्राट अशोक प्रशासन और अन्त में राष्ट्र स्तर तक जनता की भाषा उपयोग करनेवाला पहला शासक रहा। यह एक प्रायोगिक नीति रही। जिसका आधार लिपि की सरलता, एक भाषा केलिए बहुलिपियाँ, विकेन्द्रीकृत भाषा नीति, सुसंपन्न बोलियाँ रही। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारतीय भाषा को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा बना दिया।