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नकारात्मक भेदभाव और भारतीय भाषा माध्यम छात्रों का बहिष्करण


"वे लिपिक पद प्राप्त करने में भी असमर्थ है। ये बातें कहना आसान है, हम इस दुनिया में कैसे जिएगें”।

भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के.जी. बालकृष्णन

न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और बी. एस. चौहान के न्यायपीठ।


भारतीय भाषा माध्यम के स्कूलों में पढ़नेवाले ग्रामीण भारत के करोड़ों छात्रों को राष्ट्र निमार्ण में भाग लेने से वहिष्कृत करने केलिए भारत भेदमूलक उपायों का पालन कर रही है। उच्च न्यायिक प्राधिकारी के शब्दों में कहे तो भारत में भारतीय भाषा माध्यम स्कूलों में पढ़ते हुए एक व्यक्ति लिपिक भी नहीं बन सकते।

 

जबकि अफगनिस्तान, विश्व में सबसे अधिक विध्वंसित राष्ट्र है जहाँ साक्षरता दर 40% से कम है, में एक साधारण अफगान डेढ़ करोड़ जनता की भाषा दरी' में पढ़ते हुए डाक्टर. इंजीनियर या जनरल बन सकते है। जबकि मानव विकास सूचकांक में विश्व में सबसे आगे आनेवाले विकसित राष्ट्रें नार्वे एवं आइसलैडं में किसी भी छात्र वैज्ञानिक,साँफटवेयर प्रोग्रामर, फेडरल बैंक गर्वनर या अन्तर्राष्ट्रीय कपंनी के प्रबंधक बन सकते है। जहाँ इन विश्वविद्यालयों में अध्ययन कार्य आइसलैडिक और नार्वीजियन भाषा में होती है जिनको बोलनेवालों की संख्या क्रमश : 4 लाख और 48 लाख है।

 

जबकि नए स्वतंत्र राष्ट्रों में अरमेनियन, एज़ेरी, एस्टोनियन. जोर्जियन आदि पचास लाख लोगों से कम बोलनेवाली अपनी देशीय भाषाओं में अध्यापन करने वाले स्कूलों में प्रवेश पाए छात्र वास्तुशिल्पी, चिकित्सक, केमिस्ट या अधिवक्ता बन सकते है।

 

जबकि सभी विकसित राष्ट्रों में मातृभाषा का महत्व है और सभी भाषाई समूहों को अपनी क्षमता दिखाने केलिए समान अवसरें प्रदान किया जाता है। वहाँ सत्तारूढ केन्द्रीकृत कुलीन अफसरशाही उनकी फायदा केलिए साधारण जनताओं के प्रति घोर भेद भाव रखते है जिसे भाषाई अलगाव से बदत्तर कहा गया है। केन्द्रीकृत अफसरशाही शासन की भर्ती नीतियों में अंग्रेज़ी की भाषाई साम्राज्यवाद की नीतियों को क्रमिक रूप से बढ़ावा दे रहे है।